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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 116
नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा । वसित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिगृह्य च ।।
श्मशान के पास में, ग्राम के पास में, गोशाला में, मैथुन समय का वस्र पहने हुए और श्राद्ध के अन्नादि का दान लेकर अध्ययन न करे।
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