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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 42
तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम् । प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रवर्धते ॥
वही पुरुष यदि अपवित्रता से आच्छादित स्त्री से दूर रहता है तो बुद्धि, ओज, बल, दृष्टि और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
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