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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 165
ब्राह्मणायावगुर्यैव द्विजातिर्वधकाम्यया । शतं वर्षाणि तामिस्रे नरके परिवर्तते ।।
द्विजाति (भी) ब्राह्मण को मारने के लिए केवल डण्डे को उठाकर (बिना उसे मारे) ही सौ वर्ष तक तामिस्र आदि नरकों में घूमता रहता है।
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