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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 215
कर्मारस्य निषादस्य रङ्गावतरकस्य च । सुवर्णकतुर्वेणस्य शस्त्रविक्रयिणस्तथा ।।
लोहार, मल्लाह, रङ्गसाज, सोनार, बँसफोर (बांस के बर्तन बनारक जीविका करने वाला) और शस्त्र को बेचने वाला; इनके अन्न को न खावे।
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