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मनुस्मृति • अध्याय 4 • श्लोक 242
तस्माद्धर्म सहायार्थ नित्यं सञ्चिनुयाच्छनैः । धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम्‌ ।।
इस कारण (परलोक में) सहायता के लिए धीरे-धीरे धर्म का सर्वदा सञ्चय करे; क्योंकि धर्म से दुस्तर (कठिनाई से पार करने योग्य) तम (नरकादि के दुःख) को पार करता है।
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