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अध्याय 5 — पञ्चम अध्याय
मनुस्मृति
168 श्लोक • केवल अनुवाद
स्नातकों के लिये यथावत् कथित इस (चतुर्थाध्यायोक्त) धर्मो को सुनकर ऋषियों ने अग्नि से उत्पन्न भृगु मुनि से यह कहा--
हे प्रभो! इस प्रकार यथायोग्य कहे गये तथा वेदशास्तरज्ञाता अपने धर्म का आचरण करते हुए ब्राह्मणों की मृत्यु कैसे होती है?
धर्मात्मा एवं मनु के पुत्र भृगु जी ने उन महर्षियों से कहा - जिस दोष से मृत्यु ब्राह्मणों को मारने की इच्छा करती है, (उसे) आप लोग सुनिये।
वेदों का अभ्यास नहीं करने से, आचार के त्याग से; आलस्य से और अन्न (भोज्य पदार्थ) के दोष से मृत्यु ब्राह्मणों को मारने की इच्छा करती है।
लहसुन, सलगम (या लाल मूली, कोई गृञ्जन का गाजर भी अर्थ करते हैं), प्याज, छत्राक (भूकन्द-विशेष) और अपवित्र स्थान (श्मशानादि) में उत्पन्न शाक आदि द्विजातियों के लिए अभक्ष्य है।
पेड़ों का लाल गोंद तथा पेड़ों को काटने (त्वचा का कुछ अंश छिलने) से उत्पन्न गोंद, लसोड़ा और गाय का फेनुस; इनको (खाना) यत्नपूर्वक छोड़ दें।
वृथा (विना देवादि के निमित्त - अपने लिये तैयार किया) कृसरान्न (तिलमिश्रित भात), संयाव (हलुआ या मोहनभोग), खीर, पूआ या मालपूआ, अनुपाकृत (विना यज्ञ के हत) मांस, देवान्न (नैवेद्य के निमित्त निकाला हुआ अन्न); हविष्य (इनको न खावे)।
व्याने (प्रसव करने) के दिन से जिसको १० दिन न बीते हों ऐसी गाय (भैंस, बकरी आदि भी), ऊंटिनी, एक खुरवाली (घोड़ी गधी, आदि) पशु, भेड़, गर्भवती होने की इच्छा करने वाली (उठी हुई - गरमाई हुई) पशु, जिसका बच्चा मर गया हो ऐसी गाय; इनके दूध को (छोड़ दे- न पीवे)।
भैंस को छोड़कर जंगली पशु (नीलगाय, हरिण आदि) तथा स्त्री का दूध और सब प्रकार के शुक्त (कांजी या सिर्का आदि - जो अधिक समय तक रखने आदि के कारण से स्वभावतः मधुर होते हुए भी खट्टे हो गये हों, उन्हें) छोड़ दें।
शुक्तों (पूर्वश्लोक देखिये) में दही और दही के बने पदार्थ (छाछ, मतक्र आदि) और जो शुभ (नशा नहीं करने वाले) फूल, जड़ एवं फल से बने पदार्थ हैं वे भक्ष्य हैं।
कच्चा मांस खाने वाले (गीध, बाज, चील आदि) तथा ग्रामवासी (कबूतर, मैना आदि) पक्षी, नामत: निर्देश नहीं किये गये एक खुरवाले पशु (गधा आदि) और टिटहरी को छोड़ दे (इनका मांस भक्षण न करे)।
गोरैया, प्लव (एक प्रकार का पक्षी या परेवा), हंस, चकवा, ग्राम्य मुर्गा, सारस, रज्जुवाल (डोम कौआ), दात्यूह, (जल कौआ), तोता (सूआ) और मैना (इनके मांस को न खावे)।
प्रतुद (चोंच से काटकर खाने वाले पक्षी, जैसे - कठफोरवा, आदि), बत्तख कोयष्टि (कोहड़ा नामक पक्षि-विशेष), नाखून (चंगुल से बिखेरकर खाने वाले पक्षी) (तीतर आदि), पानी में गोता लगाकर मछलियों को खाने वाले पक्षी, इन पक्षियों के मांस को तथा मारने के स्थान (वधस्थान) में रखे हुए (भक्ष्य भी) मांस को और सूखे मांस को (न खावे)।
बगुला, बलाका (बक जातीय पक्षिविवेष), काकोल (करेरुआ), खजन (खँड़लिच), इन पक्षियों के मांस को, मछलियों को खाने वाले (पक्षिभिन्न नक्र आदि) ग्राम्य सूअर और सब मछलियों के मांस को (न खावे)।
जो जिसके मांस को भक्षण करता है, वह उसका "मांसाद” कहा जाता है और मछली के माँस को भक्षण करने वाला “सर्वमाँसाद" (सबके माँस का भक्षण करने वाला) कहा जाता है, इस कारण से मछली (के माँस) को छोड़ दे।
हव्य और कव्य (देवकार्य और पितृकार्य) में विहित पाठीन (पोठा याः पोठिया), रोहित (रोहू), राजीव (बरारी), सिंहतुण्ड और चोइँटा से युक्त सब प्रकार की मछलियाँ भक्ष्य हैं (किन्तु हव्य-कव्य कर्म के बिना ये भी अभक्ष्य ही हैं)।
अकेले विचरने वाले (साँप आदि), नाम तथा जाति में विशेषत: अज्ञात मृग तथा पक्षी और भक्ष्यो में कहे गये भी (विशेष निषेध के विना सामान्यत: कहे गये भी) पञ्चनख (पाँच नखवाले) प्राणी (यथा - वानर, लंगूर आदि) को नहीं खावें।
सेह या शाही, शल्यक, गोह, गेंडा, कछुआ और खरगोश इन छवों को तथा एक तरफ दाँत वाले पशु में ऊंट को छोड़कर शेष पशु का (मनु आदि) पञ्चनखों में भक्ष्य कहते हैं।
छत्राक (कवक-भूकन्धविशेष), ग्राम्य सूकर, लहसुन, ग्राम्य मुर्गा, प्याज और गृञ्जन (लाल मूली या सलगम, किसी-किसी के मत से गाजर) को बुद्धिपूर्वक खाने से द्विज पतित होता है (बुद्धिपूर्वक या अभ्यासपूर्वक इनको खाने वाले द्विज पतित, प्रायाश्चित्त को करें)।
इन छ: (५।१९) को खानेवाला (द्विज) कृच्छ सान्तपन (११।२१२) या यतिचान्द्रायण (११।२ १८) व्रत करे और अन्य अभक्ष्य पदार्थो (५।५-१७) को खाकर एक दिन उपवास करे।
श्रेष्ठ द्विज विना जाने (आज्ञात रूप में) खाये गये अभक्ष्य पदार्थो को खाने की शुद्धि के लिए वर्ष में एक बार प्राजापत्य कृच्छत्रत (११।२१ १) अवश्य करे तथा जानकर खाये गये अभक्ष्य पदार्थो की शुद्धि के लिए तो विशेष रूप से (अवश्य ही) उन स्थलों में कथित प्रायश्चित्त करे।
द्विज यज्ञ के लिए तो अवश्य तथा रक्षणीय माता-पितादि की रक्षा के लिए शासतरविहित पशु-पक्षियों का वध करे। ऐसा अगस्त्य ऋषि ने पहले किया था।
क्योंकि पहले भी मुनियों तथा ब्राह्मण-क्षत्रियों के यज्ञो में (शास्त्रानुसार) भक्ष्य पशु-पक्षियों का पुरोड़ाश (हविष्य-हव्य) बना था, (अतः शास्र-विहित पशु-पक्षियों का वध यज्ञ के लिये करना चाहिये)।
जो मोदक आदि तथा विकारहीन अन्य भोज्य पदार्थ पर्युषित (बासी) है उन्हें भी स्नेह (घृत-तैल) से संस्कारयुक्त कर तथा बचे हुए पर्युषित यज्ञान्न को बिना संस्कार किये ही खाना चाहिये।
चिरकाल (अनेक रात्रियों) के रक्खे हुए भी यव तथा गेहूँ के बने विना स्नेह (घृत-तैल) के संस्कार किये सब पदार्थ तथा दूध के बने पदार्थ (खीर, खोआ, मलाई, रबड़ी आदि) द्विजों को खाना चाहिये।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि) द्विजो के सम्पूर्ण भक्ष्य और अभक्ष्यो को यह (मैंने) कह दिया, अब मांस के खाने और न खाने की विधि को कहुँगा।
मन्त्र द्वारा प्रोक्षण संस्कार से युक्त यज्ञ में हवन किया गया मृगादि पशु का मांस, ब्राह्मणों की इच्छा से हो तब (एक ही बार, दुबारा नहीं), शास्त्रोक्त विधि के अनुसार मधुपर्क तथा श्राद्ध में नियुक्त होने पर और प्राण-सङ्कट (अन्य खाद्य के अभाव या रोग-विशेष के) होने पर मांस को अवश्य खाना चाहिये।
प्रजापति (ब्रह्मा) ने जीव का सब कुछ खाद्य कहा है, सब स्थावर (धान्य, फल, लतादिजन्य पदार्थ) तथा जङ्गम (पशु, पक्षी, जलचर आदि) जीव जीवों के खाद्य, भक्ष्य हैं।
चर (चलने-फिरने वाले मृगादि) जीवों के अचर (नहीं चलने-फिरने वाले-तृण, लता आदि); दाँतवाले (व्याघ्र सिंह आदि) जीवों के बिना दाँतवाले (हरिण आदि) जीव, हाथ सहित (मनुष्य आदि) जीवों के विना हाथ वाले (मछली, पशु, पक्षी आदि) जीव और शूरवीर (व्याघ्र, सिंह आदि) जीवों के भीरु (डरने वाले - हाथी, मृग आदि) जीव खाद्य (भक्ष्य) हैं।
प्रतिदिन भक्ष्यजीवों को खाने वाला भी भक्षक दोषी नहीं होता है; क्योंकि ब्रह्म ने ही भक्ष्य तथा भक्षक दोनों जीवों को बनाया है।
यज्ञ के लिए (शास्त्रोक्त विधि से) मांस का भक्षण करना दैव (देव सम्बन्धी) विधि है और इसके विपरीत (अपने लिए या शास्त्रविरुद्ध यज्ञ के नाम पर) मांस का भक्षण करना राक्षस (राक्षस-सम्बन्धी) विधि है (अत: अपने उदर के लिए या शास्त्रविरुद्ध यज्ञ के नाम पर - जैसा प्रायः आजकल बलिदान के नाम पर सहस्रो बकरे आदि का वध किया जाता है - मांस का भक्षण करना सर्वथा त्याज्य माना गया है)।
खरीदकर, स्वयं मारकर या किसी के द्वारा दिये हुए मांस को देवता तथा पितरों के लिए समर्पण कर खाने वाला दोषी नहीं होता है।
विधान को जानने वाला द्विज बिना आपत्तिकाल में पड़े विधिरहित (देवों या पितरों को बिना समर्पण किये) मांस को न खावे; क्योंकि विधिरहित मांस को खाने वाला मरकर उन (जिसका मांस खाया है, उन) के द्वारा विवश (लाचारपरवश) होकर खाया जाता है।
धन के लिए पशु (पक्षी आदि) का वध करने वाले (वधिक-व्याध आदि) को वैसा पाप नहीं होता, जैसा पाप व्यर्थ (देव-पितर के कार्य के बिना) माँस भक्षण करने वाले को मारने पर होता है।
शास्त्रानुसार (श्राद्ध तथा मधुपर्क में) नियुक्त जो मनुष्य माँस को नहीं खाता है, वह मरकर इक्कीस जन्म तक पशु होता है।
ब्राह्मण (द्विजमात्र, केवल ब्राह्मण ही नहीं) मन्त्रों से असंस्कृत मांस को कदापि न खावे। नित्य (प्रवाह नित्यता से चला आता हुआ) विधि को मानता हुआ मन्त्रों से संस्कृत मांस को ही खावे।
पशु-मांस भक्षण की अधिक आकांक्षा होने पर घी या आटे का पशु बनाकर खावे, किन्तु व्यर्थ (यज्ञ-श्राद्धकार्य के बिना) पशु को मारने की इच्छा कभी न करे।
वृथा (यज्ञ तथा श्राद्धकार्य के बिना) पशु को मारने वाला, पशु के शरीर में जितने रोए हैं, उतने जन्म तक उस पशु को मारकर प्रत्येक जन्म में मारा जाता है।
ब्रह्मा ने यज्ञ के लिये पशुओं को स्वयं बनाया है और यज्ञ सम्पूर्ण संसार की उन्नति के लिये है; इस कारण यज्ञ में पशु का वध (वधजन्य दोष न होने से) वध नहीं माना गया है।
यज्ञ के लिए नाश (मृत्यु) को प्राप्त औषधियाँ (ब्रीहि आदि), पशु (छाग आदि), वृक्ष (यज्ञस्तम्भ के लिये खदिरादि), तिर्यक् (कच्छप आदि) और पक्षी (कपिञ्जल आदि) फिर (जन्मान्तर में) उत्तम योनि को प्राप्त करते हैं।
मधुपर्क, यज्ञ (ज्योतिष्टोम आदि), पितृकार्यं (श्राद्ध) तथा देवकार्य में ही पशु का वध करना चाहिये। (अन्य किसी कार्य में नहीं) ऐसा मनु ने कहा है।
इन (५।४१) कर्मों से पशुवध करता हुआ देवतत्त्व को जानने वाला द्विज अपने को तथा पशु को उत्तम गति में पहुँचाता है।
गृहस्थाश्रम, ब्रह्मचर्याश्रम या वानप्रस्थाश्रम में रहता हुआ जितेन्द्रिय द्विज वेदविरुद्ध हिंसा को आपत्ति में भी न करे।
इस चराचर जगत् में जो हिंसा वेद-सम्मत है, उसे हिंसा नहीं समझे; क्योंकि वेद से ही धर्म निकला है।
जो अहिंसक जीवों को अपने सुख (जिह्वास्वाद-शरीरपुष्टि आदि) की इच्छा से वध करता है, वह जीता हुआ तथा मरकर भी कहीं पर सुखपूर्वक उन्नति को प्राप्त नहीं करता है।
जो जीवों का वध तथा बन्धन नहीं करना चाहता है, वह सबका हिताभिलाषी अत्यन्त सुख प्राप्त करता है।
जो किसी को हिंसा नहीं करता; वह जिसका चिन्तन करता है, जो कार्य करता है और जो (परमात्मचिन्तन आदि) में ध्यान लगाता है; उन सबों को बिना (विशेष प्रयत्न के ही प्राप्त करता है)।
जीवों की बिना हिंसा किये कहीं भी मांस नहीं उत्पन्न हो सकता है और जीवों की हिंसा स्वर्ग-साधन नहीं है। अत: मांस को छोड़ देना (नहीं खाना) चाहिये।
मांस की उत्पत्ति और जीवों के वध तथा बन्धन को समझकर सब प्रकार के मांस-भक्षण से निवृत्त होना चाहिए।
जो पिशाच के समान, शास्त्रोक्त विधि-विहित भी मांस-भक्षण का त्याग करता है, वह लोगों का प्रिय बनता है तथा रोगों से पीड़ित नहीं होता।
अनुमति देने वाला, शस्त्र से मरे हुए जीव के अङ्गों को टुकड़े-टुकड़े करने वाला, मारने वाला, खरीदने वाला, बेचने वाला, पकाने वाला, परोसने या लाने वाला और खाने वाला; (जीववध में) ये सभी घातक (हिंसक) होते हैं।
जो देवता तथा पितरों को बिना तृप्त किये दूसरे (जीवों) के मांस से अपने मांस को बढ़ाना चाहता है, उससे (बड़ा) कोई दूसरा पापी नहीं है।
जो प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ सौ वर्ष तक करे तथा जो मांस नहीं खावे; उन दोनों का पुण्यफल (स्वर्गादि लाभ) बराबर है।
पवित्र फल तथा कन्दो तथा मुन्यन्न (तिन्नी आदि) के खाने से (मनुष्य) वह फल नहीं पाता है, जो मांस के त्याग से पाता है।
"मैं जिसके मांस को यहाँ पर खाता हूँ, वह मुझे परलोक में खायेगा" विद्वान् "मांस" शब्द का यही मांसत्व (मांसपना अर्थात् मांस शब्द को निरुक्ति) बतलाते हैं।
मांस के खाने में, मद्य (के पीने) में और मैथुन (के करने) में दोष नहीं है; क्योंकि यह जीवों की प्रवृत्ति (स्वाभाविक धर्म) है; परन्तु उनसे निवृत्ति (उन मांसादि का त्याग करना) महान् फल (स्वर्गादि देने) वाला है।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि अब) चारों वर्णो की प्रेतशुद्धि (मरणाशौच से शुद्धि) तथा द्रव्यशुद्धि (तेजसादि पदार्थों की शुद्धि) को क्रम से यथायोग्य कहुँगा।
(बच्चों के) दाँत पैदा होने पर या शीघ्र पैदा होने वाला हो तब, चूडाकरण और यज्ञोपवीत संस्कार करने पर, मरने से सभी बान्धवों (सपिण्ड तथा समानोदक वालों) को सूतक (बच्चे के पैदा होने से सूतक) के समान अशौच होता है।
सपिण्डों को (सात पीढ़ी वालों तक) मरणाशौच दश, चार, तीन या एक अहोरात्र (दिन-रात) लगता है।
सपिण्डता सातवीं पीढ़ी में निवृत्त हो जाती है और समानोदकता जन्म तथा नाम के न जानने पर निवृत्त हो जाती है।
जिस प्रकार यह मरणाशौच सपिण्डों में कहा गया है, उसी प्रकार जन्म (बच्चा पैदा) होने पर भी पूर्ण शुद्धि चाहने वाले सपिण्डों के लिए अशौच होता है।
मनुष्य (ज्ञानपूर्वक) वीर्यपात कर स्नान करके ही शुद्ध होता है तथा पर स्त्री में बैजिक सम्बन्ध होने पर तीन दिन अशुद्धि मनानी चाहिये।
शव का स्पर्श करने वाले सपिण्ड दस दिन में शुद्ध होते हैं तथा समानोदक तीन दिन में शुद्ध होते हैं।
असपिण्ड गुरु (आचार्य, उपाध्याय आदि) के शव का स्पर्श तथा अन्त्येष्टि (दाहकर्म) करने में सम्मिलित शिष्य शव ढोने वालों के साथ दस दिन-रात में शुद्ध होता है।
तीन मास से लेकर छ: मास तक जितने मास का गर्भ गिरा हो, उतने दिनों में माता शुद्ध होती है तथा साध्वी रजस्वला स्त्री रज के निवृत्त होने पर स्नान से (पाँचवें दिन) शुद्ध (यज्ञ-देवपूजन में भाग लेने योग्य) होती है।
चूडाकरण संस्कार से पहले बालक के मरने पर एक दिन में और चूड़ाकरण संस्कार के बाद तथा उपनयन (यज्ञोपवीत) संस्कार करने के पहले बालक के मरने पर तीन दिन में सपिण्डों की शुद्धि होती है।
दो वर्ष से कम अवस्था वाले मरे हुए बच्चे को मालादि पहनाकर पवित्र भूमि पर (ग्राम से) बाहर बिना अस्थिसंचय किये ही छोड़ दें।
इस (दो वर्ष से कम आयु वाले बालक) का अग्निसंस्कार (दाहकर्म) तथा उदकक्रिया (तिलाञ्जलि देना) न करे किन्तु उसे जंगल में काष्ठ के समान छोड़कर तीन दिन अशौच मनावे।
तीन वर्ष की आयु में नहीं पहुँचे हुए अर्थात् दो वर्ष से कम आयु वाले मृत बालक की जलक्रिया (तिलाञ्जलि-- दान तथा दाह आदि कर्म) (बान्धव-मृत बालक के पिता आदि) न करें । अथवा दाँत जमने पर या नामकरण संस्कार के ही हो जाने पर उस मृत बालक के निमित्त जलाञ्जलि दे (और दाह कर्म तथा श्राद्ध भी करे)।
सहपाठी (एक गुरु के साथ पढ़े हुए) ब्रह्मचारी के मरने पर एक दिनरात अशौच होता है और समानोदक (५।६०) के यहाँ सन्तानोत्पत्ति होने पर तीन रात (दिन-रात) में शुद्धि होती है।
पहले दूसरे की रहकर बाद में जो अपनी स्त्री हुई हो, ऐसी स्त्री में उत्पन्न पुत्र के जननाशौच और मरणाशौच मातामह (नाना) को तीन दिन और सपिण्डन को एक दिन होता है।
(अशौच वालों को) कृत्रिम लवण से रहित अन्न (पायस = खीर आदि) खाना चाहिए, तीन दिन नदी आदि में स्नान करना चाहिये, मांस-भोजन का त्याग करना चाहिये और अलग-अलग भूमि पर (पलंग या खाट पर नहीं) सोना चाहिये।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि--) पास में मरने पर यह अशौच की विधि मैने कही है, अब पास में न मरने पर अर्थात् परदेश या परोक्ष में- जहाँ कोई अपना बान्धव नहीं हो वहाँ मरने पर आगे कही हुई विधि सम्बन्धियों (सपिण्ड तथा समान उदक वाले बन्धुओं) को जाननी चाहिये।
विदेश में मरे हुए बान्धव को दस दिन बीतने के पहले जो सुने, वह जितने दिन (दस दिन पूरा होने में) बाकी है, उतने ही दिनों तक अशुद्ध रहता है।
विदेश में मृत बान्धव का समाचार मरने के दस दिन बाद सुनकर सपिण्ड तीन दिन में शुद्ध होता है तथा एक वर्ष बीतने पर उक्त समाचार सुनकर केवल स्नान करने से सपिण्ड शुद्ध (अशौच से रहित) हो जाता है।
दस दिन बीतने पर सपिण्ड बान्धव का मरण या पुत्र का जन्म सुनकर वस्रसहित स्नान करके मनुष्य शुद्ध (स्पर्श के योग्य) हो जाता है।
बालक (बिना दांत उत्पन्न हुए) तथा समानोदक (सपिण्ड नहीं-५।६०) बान्धव के मरने पर मनुष्य वस्त्र के साथ स्नान कर तत्काल शुद्ध हो जाता है।
पूर्वागत अशौच या सूतक के दस दिन बीतने के पहले ही फिर किसी का मरण या जन्म होने पर तब पहले अशौच तथा सूतक के दस दिन पूरा होने से ही ब्राह्मण (द्विज) शुद्ध हो जाता है । (पहले अशौच तथा सूतक में ही दूसरे अशौच या सूतक का अन्तर्भाव हो जाता है)।
आचार्य (२।१४०) के मरने पर तीन (दिन-रात), और आचार्य-पुत्र तथा आचार्य-पत्नी के मरने पर एक दिन-रात अशौच होता हे, यह शास्त्र मर्यादा है।
श्रोत्रिय (अपने गृह में रहने वाला मित्रभावापन्न वेदपाठी), के मरने पर तीन रात तथा मामा, शिष्य, ऋत्विक् (२।१४३) और बान्धव के मरने पर पक्षिणी रात्रि (वर्तमान दिन तथा अगले दिन सायंकाल तक) अशौच होता है।
जिसके देश में रहता हो, उस अभिषिक्त राजा के दिन में मरने पर सायं (सूर्यास्त) काल तक और रात में मरने पर प्रातःकाल (ताराओं के रहने का समय) तक अशौच होता है । घर में रहने वाले अश्रोत्रिय (श्रोत्रिय के लिये तीन रात पहले (५।८१) कह चुके हैं), अनूवान (अड्डों के सहित वेद पढ़ने वाला) और गुरु (२।१४९, १४२ भी) के दिन में मरने पर केवल सायंकाल तक और रात में मरने पर प्रातःकाल तक अशौच रहता है।
यज्ञोपवीत संस्कार से युक्त सपिण्ड के मरने पर ब्राह्मण दस दिन में, क्षत्रिय बारह दिन में, वैश्य पन्द्रह दिन में और शूद्र एक मास में शुद्ध होता है।
अंशौच के दिनों को स्वयं न बढ़ावे और (वैसा करके) अग्निहोत्र कर्म का विघात न करे। उस कर्म को करता हुआ सपिण्ड (पुत्रादि) भी अशुद्ध नहीं होता है।
चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित (ब्रह्मघाती आदि, ११ अध्यायोक्त), सूतिका (जच्चा), मुर्दा तथा मुर्दे का स्पर्श करने वालों का स्पर्श कर स्नान मात्र से शुद्धि होती है।
श्राद्ध या देव-पूजन करने का इच्छुक व्यक्ति स्नानादि से शुद्ध होकर चाण्डाल आदि अशुद्ध व्यक्तियों को देखने पर उत्साहानुसार सूर्यमन्त्र का: तथा यथाशक्य “पावमानी” मन्त्र का जप करे।
मनुष्य की गीली (रक्तादि से युक्त-ताजी) हड्डी छूकर स्नान करने से ब्राह्मण शुद्ध होता है तथा सूखी हड्डी को छूकर आचमन करने, गौ का स्पर्श करने या सूर्यदर्शन करने से शुद्ध होता है।
व्रती ब्रह्मचारी व्रत के समाप्त होने के पहले तिलाझलि न दे (तथा पूरक पिण्ड एवं षोडशी श्राद्ध आदि भी न करे), व्रत के समाप्त हो जाने पर तिलाज्ञलि देकर तीन रात में (दिन-रात अशौच मनाकर) शुद्ध होता है।
मनु के अग्रिम (५।९ १) वचनानुसार तथा वसिष्ठ के वचनानुसार ब्रती ब्रह्मचारी को भी अपने आचार्य (२।१४०), उपाध्याय (२।१४१), पिता-माता और गुरु (२।१४२) के अतिरिक्त मृत व्यक्ति के निमित्त तिलाञ्जलि-दान आदि कर्मा का निषेध है, अपने आचार्य आदि के लिये तिलाञ्जलि-दान आदि करने पर भी इस (ब्रह्मचारी) का ब्रत खण्डित नहीं होता है।
पाखण्ड का आश्रय (वेद-वचन-विरुद्ध काषाय वस्र आदि को धारण) करने वाली, स्वेच्छाचारिणी (स्वेच्छा से एक या अनेक पुरुष का संसर्ग करने वाली), गर्भपात तथा पतिहत्या करने वाली और मद्य पीने वाली स्त्रियों का तिलाङ्जलिदान श्राद्ध आदि नहीं करना चाहिये।
अपने आचार्य (२।१४०), उपाध्याय (२।१४१), पिता, माता और गुरु (२।१४२) के शव को बाहर निकालकर (दाह, दशाह और श्राद्ध करके भी) व्रती ब्रह्मचारी व्रत से भ्रष्ट नहीं होता है।
मरे हुए शूद्र को नगर के दक्षिण द्वार से बाहर निकाले और अन्य द्विजों (वैश्य, क्षत्रिय और ब्राह्मण) के शव को क्रमशः नगर के पश्चिम, उत्तर तथा पूर्व के द्वार से बाहर निकाले अर्थात् मृत ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र के शव को क्रमश: नगर के पूर्व, उत्तर, पश्चिम तथा दक्षिण दिशा के द्वारों से बाहर निकालना ना चाहिए।
अभिषिक्त राजा, व्रती (ब्रह्मचारी तथा चान्द्रायणादि व्रत करने वाले), यज्ञकर्ता (यज्ञ में दीक्षित) लोगों को (सपिण्ड के मरने पर) अशुद्धि (अशौच) दोष नहीं होता है; क्योंकि राजा अभिषिक्त होने से इन्द्रपद को प्राप्त होते हैं तथा ब्रती और यज्ञकर्ता ब्रह्मतुल्य निर्दोष हैं।
राजसिंहासनारूढ़ राजा की (राज्य्रष्ट राजा की नहीं) तत्काल शुद्धि होती है, इसमें प्रजा की रक्षा के लिये राजसिंहासन ही कारण है।
नृप से रहित युद्ध में मारे गये, बिजली से मरे हुए, राजा (किसी अपराध में राजदण्ड) से मारे गये अर्थात् प्राणदण्ड प्राप्त, गौ. तथा ब्राह्मण की रक्षा के लिए (युद्ध के बिना भी जल, अग्नि या व्याघ्र आदि से) मारे गये और (अपनी कार्य हानि नहीं होने के लिए) राजा जिसकी तत्काल शुद्धि चाहता हो, उसकी (तत्काल शुद्धि हो जाती है)।
राजा चन्द्र, अग्नि, सूर्य, वायु, कुबेर, इन्द्र, वरुण और यम इन आठौं लोकपालों के शरीर को धारण करता है।
(अतएव) राजा लोकपालों के अंश से अधिष्ठित है, इस कारण इस (राजा) को अशौच नहीं होता है; क्योंकि मनुष्यों की शुद्धि या अशुद्धि लोकपोलों से होती है या नष्ट (दूर) होती है । (अतएव दूसरों की शुद्धि और अशुद्धि के उत्पादक और विनाशक लोकपालों के अंशभूत राजा की अशुद्धि कैसे हो सकती है?)।
युद्ध में क्षत्रिय-धर्म से (तलवार आदि के प्रहार से, लाठी या पत्थर आदि से नहीं) मारे गये व्यक्ति का ज्योतिष्टोमादि यज्ञ तत्काल ही पूर्ण (ज्योतिष्टोमादि का फल प्रप्त) होता है और अशौच भी तत्काल नष्ट होता है, ऐसी शास्त्र की मर्यादा है।
अशौच के बाद यज्ञादि को किया हुआ ब्राह्मण जल का, क्षत्रिय वाहन (रथ, हाथी, घोड़ा आदि) का, वैश्य कोड़े (या चाबुक) या रथ के बाग (रास) का और शूद्र छड़ी (या लाठी) का (दाहिने हाथ से) स्पर्श कर शुद्ध होता है।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि) हे ब्राह्मणो! सपिण्डों के मरने पर यह शुद्धि (मैंने) आप लोगों से कही, अब, आप लोग सब सपिण्डों के मरने पर शुद्धि को सुनो।
ब्राह्मण मरे हुए असपिण्ड द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) को तथा माता के आप्त (सहोदर भाई, भगिनी आदि) बान्धवों का स्नेहपूर्वक (अदृष्ट भावना के बिना) बाहर निकालकर तीन रात्रि (दिन-रात) में शुद्ध होता है।
पूर्व (५।१०१) श्लोकोक्त मृत असपिण्ड द्विज के शव को स्नेह से बाहर निकालकर यदि ब्राह्मण उसका अन्न भोजन करे तो दस दिन में शुद्ध होता है और यदि उस मृत असपिण्ड द्विज के अन्न को नहीं खाता हो और उसके घर में भी नहीं रहता हो तब (उसके शव को बाहर निकालने पर) एक दिन (दिन-रात) में वह ब्राह्मण शुद्ध हो जाता है। (और उसके घर रहने पर तथा उसका अन्न नहीं खाने पर तीन रात में शुद्ध होता है)।
अपनी जाति वाले या भिन्न जाति वाले शव के पीछे इच्छापूर्वक जाकर वस्त्र सहित स्नान कर, अग्नि का स्पर्श कर फिर घृत का प्राशन कर शुद्ध होता है।
स्वबान्धवों के उपस्थित रहने पर मृत ब्राह्मण को शूद्र के द्वारा बाहर न निकलवावे; क्योंकि वह निर्हरण (शूद्र के द्वारा विप्र के शव का बाहर निकलवाना) स्वर्ग प्राप्ति में बाधक होता है।
ज्ञान, तप, अग्नि, आहार, मिट्टी, मन, जल, अनुलेपन, वायु, कर्म (यज्ञादि कृत्य), सूर्य और समय, ये देहधारियों की शुद्धि करने वाले हैं।
सब शुद्धियों में धन की शुद्धि। (न्यायोपार्जित धन का होना) ही श्रेष्ठ शुद्धि कही गयी है, जो धन में शुद्ध है अर्थात् जिसने अन्याय से किसी का धन नहीं लिया है, वही शुद्ध है जो केवल मिट्टी जल आदि से शुद्ध है (परन्तु धन से शुद्ध नहीं है, अर्थात् अन्याय से किसी का धन ले लिया), वह शुद्ध नहीं है।
विद्वान् क्षमा से, अकार्य (धर्म-विरुद्ध कार्य) करने वाले दान देने से, गुप्त पाप करनेवाले (गायत्री आदि वेदमन्त्रों के) जप से तथा श्रेष्ठ वेदज्ञाता तपस्या से शुद्ध हो जाते हैं।
मलिन (मैले पात्र आदि) मिट्टी तथा जल से, नदी (थूक, खकार एवं मल-मूत्रादि से दूषित नदी-प्रवाह) वेग अर्थात् धारा से, मानसिक पाप करने वाली स्त्री रज (रजस्वला होने) से और ब्राह्मण संन्यास से शुद्ध होते हैं।
(पसीना आदि से दूषित) शरीर जल से (स्नानादि कर्म से), (निषिद्ध विचार-दूषित) मन सत्य से, जीवात्मा ब्रह्मविद्या तथा तप से तथा बुद्धि-ज्ञान से शुद्ध हो जाती है।
(महर्षियों से भृगु मुनि कहते हैं कि मैंने) आप लोगों से शारीरिक (शरीर-सम्बन्धी) शुद्धि का यह निर्णय कहा, अब अनेक प्रकार के द्रव्यों की शुद्धि का निर्णय आप लोग सुनें।
तेजस पदार्थ (सोना आदि), मणि (मरकत-पन्ना आदि रत्न), और पत्थर के बने सर्वविध पदार्थ (वर्तन आदि) की शुद्धि भस्म, मिट्टी और जल से होती है, ऐसा मनु आदि विद्वानों ने कहा है।
घृतादि के लेप से रहित (तथा जो जूठा न हो ऐसे) सुवर्ण-पात्र, जल में होने वाले शङ्ख-मोती आदि, फूल-पत्ती या चित्रादि से रहित अर्थात् सादे चाँदी के बर्तन आदि की शुद्धि केवल जल से ही होती है।
पानी तथा अग्नि के संयोग से सुवर्ण तथा चाँदी उत्पन्न हुए हैं। अतएव इन (सुवर्ण तथा चाँदी) की शुद्धि भी अपनी योनि (उत्पत्ति-स्थान अर्थात् जल और अग्नि) से ही उत्तम होती है।
तांबा, लोहा, काँसा, पीतल, रांगा, और सीसा; इन के बने बर्तन आदि की शुद्धि यथायोग्य राख, खटाई का पानी और पानी से करनी चाहिये।
सभी द्रव (बहने वाले घी तेल आदि) पदार्थों की शुद्धि । एक प्रसृति अर्थात् एक पसर - लगभग ढाई-तीन छटाक हो तो प्रादेश मात्र (अँगूठे तथा तर्जनी को फैलाने पर जो लम्बाई हो उतना प्रमाण) मापे हुए (दो कुश-पत्रों की) हवा करने से, शय्या आदि संहत (परस्पर में सटी हुई) वस्तुओं की शुद्धि पानी का छींटा देने से और काष्ठ के बर्तन आदि की शुद्धि (उन्हें-थोड़ा-थोड़ा) छीलने से होती है।
चमस, ग्रह तथा अन्य यज्ञपात्रों की शुद्धि यज्ञ कर्म में हाथ से पोंछकर जल से धोने से होती है।
(घृत आदि स्नेह से लिप्त) चरु; स्रक् और खुवों की शुद्धि गर्म पानी (के द्वारा धोने) से होती है तथा स्फ्य, शूर्प शकट, मूसल और ओखली।
और बहुत से धान्य तथा वस्रो की शुद्धि पानी छिड़कने से होती है तथा थोड़ी मात्रा में होने पर अन्न तथा वस्त्र की शुद्धि उन्हें धोने पर होती है।
(स्पृश्य पशुओं - गाय, भैंस; घोड़े, मृग-आदि के) चमड़े और बांस के बर्तनों की शुद्धि वस्र के समान तथा शाक, मूल और फलों की शुद्धि धान्य के समान (पानी छिड़कने से) होती है।
रेशमी और ऊनी वस्त्रों की खारी मिट्टी से, नेपाली कम्बलों की रीठे से, पट्टवस्त्रों की बेल के फलों से और क्षीम (अलसी आदि के छाल से बने) वस्त्रों की शुद्धि पिसे हुए सफेद सरसों के कल्क से होती है।
शंख, (स्पृश्य पशुओं के) सींग, हड्डी और दाँत से बने पदार्थो (यथा-कंघी, कलम, बटन, चाकू के बेंट एवं दूसरे खिलौने आदि उक्त शङ्क, सींग; हाथी आदि की हड्डियों एवं हाथी-दाँतों से बने पदार्थो) की शुद्धि क्षौम वस्रों के समान (पीसे हुए सफेद सरसों के कल्क द्वारा धोने से), गोमूत्र से या जल से शुद्धि - विषय को जानने वालों को करनी चाहिए।
(चण्डालादि अस्पृश्य - स्पर्श से दूषित) घास, लकड़ी और पुआल पानी छिड़कने से शुद्ध होते हैं; (रजस्वला, प्रसूति आदि के रहने से दूषित) घर झाड़ देने तथा लीपने से और उच्छिष्ट आदि से दूषित मिट्टी के बर्तन फिर पकाने से शुद्ध होते हैं।
मद्य, मूत्र, मल (पाखाना), थूक या खकार, पीव और रक्त से दूषित मिट्टी के बर्तन फिर पकाने से भी शुद्ध नहीं होते हैं । (यह वचन ५।१२२ श्लोक के चतुर्थ पादोक्त शुद्धि का बाधक है)
(जूठा, मल, मूत्र थूक, खकार, पीब, रक्त, चण्डाल आदि के निवास से दूषित) भूमि की शुद्धि झाड़ू देने से, लीपने से, गोमूत्र या जल आदि के छिड़कने से ऊपर की कुछ मिट्टी को खोदकर फेंक देने से और (एक दिन-रात) गायों के रहने से होती है।
कौआ, गीध आदि अभक्ष्य पक्षियों को छोड़कर अन्य भक्ष्य) पक्षियों के खाये हुए, गौ से सूँधे हुए, पैर से छूए हुए, जिसके ऊपर छींक दिया गया हो उसकी एवं बाल तथा कीड़े आदि से दूषित (थोड़े अन्न आदि भक्ष्य पदार्थ) की शुद्धि (थोड़ी) मिट्टी डालने से होती है।
विष्ठा आदि से दूषित पात्र आदि से जब तक गन्ध तथा लेप (चिकनाहट) दूर न हो जाए, तब तक उनको मिट्टी तथा जल से शुद्ध करते रहना चाहिये।
देवताओं ने तीन प्रकार की वस्तुओं को ब्राह्मणों के लिए पवित्र कहा है-प्रथम जिसकी अशुद्धि स्वयं आँखों से नहीं देखी गयी हो! द्वितीय - अशुद्धि का सन्देह होने पर जिस पर जल छिड़क दिया गया हो तथा तृतीय - जो वचन से प्रशस्त कहा गया हो अर्थात् जिसको “यह पवित्र है” ऐसा ब्राह्मण कह दे।
जिससे गौ की प्यास दूर हो जाय, जो अपवित्र वस्तु (मल, मूत्र, हड्डी, रक्तादि) से दूषित न हो, जो वर्ण, रस और गन्ध में ठीक हो; ऐसा पृथ्वी पर स्वभावत: स्थित पानी शुद्ध होता है।
कारीगर का हाथ, बाजार में (बेचने के लिये) फैलायी (या रखी गयी) वस्तु और ब्रह्मचारी को प्राप्त भिक्षाद्रव्य सर्वदा शुद्ध है; ऐसी शास्त्र-मर्यादा है।
स्त्रियों का मुख सर्वदा शुद्ध है, फल गिराने में पक्षी (काक आदि का मुख) शुद्ध है अर्थात् काक आदि पक्षी के चोंच मारने से गिरा हुआ फल शुद्ध है, (भैंस-गाय को) पेन्हाने (दूहने के पहले पीने) में वत्स (बछड़ा तथा बछिया या पाड़ा-पाड़ी आदि दूध देने वाली पशु के बच्चों का मुख) शुद्ध है और (शिकार के समय) हरिण (आदि पशु पकड़ने) में कुत्ता (का मुख) शुद्ध है।
(शिकार में) कुत्तों से मारे गये (मृग आदि पशुओं तथा पक्षियों) के मांस को मनु ने शुद्ध कहा है । तथा कच्चे मांस को खाने वाले (व्याघ्र, भेड़िया आदि पशु तथा गीध-बाज आदि पक्षियों) तथा व्याध आदि के द्वारा मारे हुए (पशुं-पक्षियों) का मांस शुद्ध होता है।
नाभि से ऊपर जितने छिद्र (कान, आँख, नाक आदि) इन्द्रियाँ हें, वे स्पर्श में शुद्ध हैं और (नाभि) के नीचे वाले छिद्र (गुदा, आदि) तथा शरीर से निकली मैल (मल, मूत्र, कफ, थूक, खोंट आदि) सभी अशुद्ध हैं।
मक्खी, (मुख से निकली छोटी-छोटी) बुँदे, छाया (परछाहीं) गौ, घोड़ा, सूर्यकिरण, धूलि, भूमि, वायु तथा अग्नि को स्पर्श में शुद्ध जानना चाहिये।
मल-मूत्र त्याग करने वाली इन्द्रियों (गुदा तथा लिङ्ग) की तथा शरीर के वसा आदि मल-मूत्र सम्बन्धी बारह अशुद्धियों की गन्ध-लेप-क्षय के द्वारा शुद्धि होने के लिये आवश्यकतानुसार मिट्टी तथा पानी लेना चाहिये।
वसा (चर्बी), वीर्य (शुक्र-धातु), रक्त, मज्जा (मस्तिष्कस्थित धातुविशेष), मूत्र, मल (विष्ठा), नकटी याने नेटा (नाक की मैल), खोंट (कान की मैल), कफ (थूक = खकार-पान की पीक आदि मुख की मैल); आँसू, कीचर (आंख से निकलने वाली श्वेत वर्ण की मैल) और पसीना- ये बारह मल मनुष्यों के हैं।
शुद्धि चाहने वाले को लिङ्ग में एक, गुदा में तीन, हाथ (बांये हाथ) में दस और दोनों हाथों में सात बार मिट्टी लगानी चाहिये।
यह (पूर्व श्लोकोक्त संख्यानुसार) शुद्धि गृहस्थों के लिये है, ब्रह्मचारियों के लिये उससे द्विगुणित बार, वानग्रस्थों के लिये त्रिगुणित बार, सन्यासियों के लिये चतुर्गुणित बार मिट्टी लगाने आदि की क्रिया करनी चाहिये।
मल या मूत्र का त्यागकर वेदाध्ययन का इच्छुक या भोजन करता हुआ उक्त (५।१३६-१३७) शुद्धि करके (तीन बार) आचमन कर छिद्रेन्द्रियो (नाक, कान तथा नेत्र, मस्तक आदि) का स्पर्श करे।
शारीरिक शुद्धि को चाहता हुआ मनुष्य तीन बार जल से आचमन करे, दो बार मुख पोछे और स्त्री तथा शूद्र एक-एक बार आचमन करे।
यथाशासत्र आचरण (द्विज-सेवा) करने वाले शूद्रों को एक मास पर मुण्डन कराना चाहिये, वैश्य के समान (मृतक सूतक आदि में) शुद्धि विधान करना चाहिये और ब्राह्मण के उच्छिष्ट का भोजन करना चाहिये।
मुख से निकलकर शरीर पर पड़ने वाली छोटी-बूँदें, मुख में पड़ते हुए मूँछ के बाल और दाँतों के बीच में अटका हुआ अन्नादि मनुष्य को जूठा नहीं करते हैं।
(दूसरे को) कुल्ला कराते या पानी पिलाते हुए व्यक्ति के पैरों पर पड़ने वाली बुँदों (छीटो) को भूमि पर पड़े हुए (जल) के समान मानना चाहिए, उनसे (वह व्यक्ति अशुद्ध होकर) आचमन करने योग्य नहीं होता अर्थात् वह शुद्ध ही रहता है।
भोजन-सामग्री (पका हुआ अन्न कच्चा अन्न या फल आदि नहीं) को लिया हुआ व्यक्ति यदि किसी जूठे मुंह बाले व्यक्ति का स्पर्श कर ले तो वह भोजनः सामग्री को बिना रखे ही आचमन करने से शुद्ध हो जाता है।
वमन एवं शौच करने पर स्नान कर घी खाने से तथा भोजन करते ही वमन करे तो आचमन करने से और ऋतुकाल के बाद शुद्ध स्त्री के साथ सम्भोग करके स्नान करने से शुद्धि होती है।
सोकर, छींककर, भोजनकर, थूककर, असत्य बोलकर और पानी पीकर तथा भविष्य में पढ़ने वाला व्यक्ति शुद्ध रहने पर भी आचमन करे।
भृगुजी महर्षियों से कहते है कि - सब वर्णो का जन्म-मरण-सम्बन्धी अशौच शुद्धि को तथा द्रव्यशुद्धि को (५।५७-१६५) आप लोगों से मैंने कहा, अब (आप लोग) स्त्रियों के धर्मो को सुनें।
बचपन में, जवानी में और बुढ़ापे में भी खरी को (अपने) घरों में भी अपनी इच्छा से (क्रमशः पिता, पति और पुत्र आदि अभिभावक की सम्मति के बिना मनमाना) कोई भी काम नहीं करना चाहिये।
स्त्री बचपन में पिता के, जवानी में पति के और पति के मर जाने पर बुढ़ापे में पुत्र के वश में रहे (उनकी आज्ञा तथा सम्मति के अनुसार कार्य करे) स्वतंत्र कभी न रहे।
स्त्री को (बचपन, जवानी और बुढ़ापे में क्रमशः) पिता, पति और पुत्र से वियुक्त (अलग रहकर स्वतन्त्र) रहने की इच्छा नहीं करनी चाहिये; क्योंकि उनके अभाव से स्त्री दोनों (पिता तथा पति) के वंशों को निन्दित कर देती है।
स्त्री को सर्वदा (पति आदि के रोष में भी) प्रसन्न, गृह-कार्यो में चतुर, घर के बर्तन आदि को शुद्ध एवं स्वच्छ रखने वाली और अधिक व्यय नहीं करने वाली (अपने अभिभावक की आय के अनुसार कुछ धन बचाते हुए व्यय करने वाली) होना चाहिये।
पिता या पिता की अनुमति से भाई इस (स्त्री) को जिसके लिये दे अर्थात् जिसके साथ विवाह कर दे, (स्त्री) जीते हुये उस पति की सेवा करे और उसके मरने पर (भी व्यभिचार, उसके श्राद्ध आदि का त्याग तथा पारलौकिक कार्य के खण्डन से) उस (पति) का उल्लंघन न करे।
इन (स्त्रियों) के विवाह में जो स्वस्त्ययन पढ़ा जाता है तथा प्रजापति के उद्देश्य से जो हवन आदि किया जाता है, वह (मङ्गलार्थ अभीष्ट लाभ के लिये विहित कर्म) तथा वाग्दान स्वामित्व का कारण है । (अतएव वाग्दान के बाद से स्त्री पति के अधीन हो जाती है)
विवाहकर्ता (पति) स्त्री को ऋतुकाल में तथा ऋतु-भिन्न काल में भी नित्य ही इस लोक में तथा परलोक में (सेवादिजन्य पुण्यकार्यो के द्वारा स्वर्गादि प्राप्ति से) सुख देने वाला है।
सदाचार से हीन, परस्त्री में अनुरक्त और विद्या आदि गुणों से हीन भी पति पतिव्रता स्त्रियों का देवता के समान पूज्य होता है।
स्त्रियो के लिये पृथक् (पति के बिना) यज्ञ नहीं है, और (पति की आज्ञा के बिना) व्रत तथा उपवास नहीं है; पति की सेवा से ही स्त्री स्वर्गलोक में पूजित होती है।
पतिलोक को चाहने वाली पतिव्रता स्त्री जीवित या मृत पति का अप्रिय कोई कार्य (व्यभिचार से या शास्त्रोक्त श्राद्धादि के त्याग से) न करे।
पति के मर जाने पर (जीविका रहने पर भी) पवित्र (सात्विक गुणयुक्त) पुष्प, कन्द और फल (के आहार) से शरीर को क्षीण करे (व्यभिचार की भावना से दूसरे पुरुष का) नाम भी न ले।
एक पत्नी व्रत (जिसका एक ही पति है, वह) अनुत्तम धर्म चाहने वाली स्त्री मरने तक अर्थात् जीवन-पर्यन्त क्षमायुक्त, नियम से रहने वाली तथा मधु-मांस-मद्य को छोड़कर ब्रह्मचर्य से रहने वाली बने।
बाल्यावस्था से ही ब्रह्मचर्य पालने वाले (सनक, बालखिल्य आदि) अनेकों सहस्र ब्राह्मण वंशवृद्धि के लिये संतानोत्पत्त को बिना किये ही स्वर्ग गये हैं।
पति के मरने पर ब्रह्मचारिणी रहती हुई पतिव्रता स्त्री (परपुरुष-संसर्ग से) पुत्र को बिना पैदा किये ही उन (सनकादि) ब्रह्मचारियों के समान स्वर्ग को जाती है।
सन्तान के लोभ से जो स्त्री पति का उल्लङ्घन (व्यभिचार) करती है, वह इस लोक में निन्दा को प्राप्त करती है और उस पुत्र के द्वारा स्वर्ग से भी भ्रष्ट होती है।
इस लोक में परपुरुष से उत्पन्न सन्तान तथा परस्त्री में उत्पन्न सन्तान शास्त्रोक्त सन्तान नहीं होती है और पतिव्रता स्त्रियों का दूसरा पति भी कहीं पर (किसी शास्त्र में) नहीं कहा गया है।
जो स्त्री नीचवर्ण (क्षत्रिय आदि) पति को छोड़कर उच्चवर्ण (ब्राह्मण आदि) पति का आश्रय (उसके साथ संभोग) करती है, वह भी लोक में निन्दित ही होती है और "पहले इसका दूसरा पति था” ऐसा लोग कहते हैं।
परपुरुष के साथ संभोग करने वाली स्त्री इस लोक में निन्दित होती है, मरकर शृगाल की योनि में उत्पन्न होती है और (कुष्ठ आदि) पाप-रोगों से दुःखी होती है।
मन, वचन तथा काय से संयत रहती हुई जो स्त्री पति के विरुद्ध कोई कार्य (व्यभिचारादि) नहीं करती है, वह पति लोक को प्राप्त करती है तथा उसे सज्जन लोग “पतिव्रता' कहते हैं।
मन-वचन-कार्य से संयत स्त्री इस (५।१४४-१६३) स्त्री-व्यवहार (पति-शुश्रूषा आदि) से इस लोक में उत्तम यश को और परलोक में पति के साथ अर्जित स्वर्ग आदि शुभ लोकों को प्राप्त करती है।
ऐसे (५।१४४-१६४) आचरण वाली पहले मरी हुई सवर्णा स्त्री को दाहक्रिया धर्मज्ञ द्विजाति अग्निहोत्र की अग्नि तथा यज्ञपात्रों से विधिवत् करे।
पहले मरी हुई स्त्री का दाहकर्म आदि अन्त्येष्टि संस्कार करके गृहस्थाश्रम को चाहने वाला (सपुत्र या अपुत्र) द्विजाति फिर विवाह करे अथवा श्रौताग्नि का आधान करे।
इस प्रकार सर्वदा (करता हुआ द्विज) पञ्चमहायज्ञों (३।७०) का त्याग कदापि नहीं करे, आयु के द्वितीय भाग को (शास्त्रानुसार) विवाह कर गृहस्थाश्रम में निवास करे।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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