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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 87
आदिष्टो नोदकं कुर्यादाब्रतस्य समापनात्‌ । समाप्ते तूदकं कृत्वा त्रिरात्रेणैव शुद्धयति ।।
व्रती ब्रह्मचारी व्रत के समाप्त होने के पहले तिलाझलि न दे (तथा पूरक पिण्ड एवं षोडशी श्राद्ध आदि भी न करे), व्रत के समाप्त हो जाने पर तिलाज्ञलि देकर तीन रात में (दिन-रात अशौच मनाकर) शुद्ध होता है।
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