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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 107
मृत्तोयैः शुद्ध्यते शोध्यं नदी वेगेन शुद्ध्यति । रजसा स्त्री मनोदुष्टा संन्यासेन द्विजोत्तमाः ।।
मलिन (मैले पात्र आदि) मिट्टी तथा जल से, नदी (थूक, खकार एवं मल-मूत्रादि से दूषित नदी-प्रवाह) वेग अर्थात्‌ धारा से, मानसिक पाप करने वाली स्त्री रज (रजस्वला होने) से और ब्राह्मण संन्यास से शुद्ध होते हैं।
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