द्रवाणां चैव सर्वेषां शुद्धिरुत्पवनं स्मृतम् ।
प्रोक्षणं संहतानां च दारवाणां च तक्षणम् ।।
सभी द्रव (बहने वाले घी तेल आदि) पदार्थों की शुद्धि । एक प्रसृति अर्थात् एक पसर - लगभग ढाई-तीन छटाक हो तो प्रादेश मात्र (अँगूठे तथा तर्जनी को फैलाने पर जो लम्बाई हो उतना प्रमाण) मापे हुए (दो कुश-पत्रों की) हवा करने से, शय्या आदि संहत (परस्पर में सटी हुई) वस्तुओं की शुद्धि पानी का छींटा देने से और काष्ठ के बर्तन आदि की शुद्धि (उन्हें-थोड़ा-थोड़ा) छीलने से होती है।
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