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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 37
कुर्याद्घृतपशुं सङ्गे कुर्यात्पिष्टपशुं तथा । न त्वेव तु वृथा हन्तुं पशुमिच्छेत्कदाचन ।।
पशु-मांस भक्षण की अधिक आकांक्षा होने पर घी या आटे का पशु बनाकर खावे, किन्तु व्यर्थ (यज्ञ-श्राद्धकार्य के बिना) पशु को मारने की इच्छा कभी न करे।
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