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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 118
चैलवच्चर्मणां शुद्धिर्वैदलानां तथैव च । शाकमूलफलानां तु धान्यवच्छुद्धिरिष्यते ।।
(स्पृश्य पशुओं - गाय, भैंस; घोड़े, मृग-आदि के) चमड़े और बांस के बर्तनों की शुद्धि वस्र के समान तथा शाक, मूल और फलों की शुद्धि धान्य के समान (पानी छिड़कने से) होती है।
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