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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 127
आपः शुद्धा भूमिगता वैतृष्ण्यं यासु गोर्भवेत्‌ । अव्याप्ताश्चेदमेध्येन गन्धवर्णरसान्विताः ।।
जिससे गौ की प्यास दूर हो जाय, जो अपवित्र वस्तु (मल, मूत्र, हड्डी, रक्तादि) से दूषित न हो, जो वर्ण, रस और गन्ध में ठीक हो; ऐसा पृथ्वी पर स्वभावत: स्थित पानी शुद्ध होता है।
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