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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 164
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता । सा भर्तृलोकमाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते ।।
मन, वचन तथा काय से संयत रहती हुई जो स्त्री पति के विरुद्ध कोई कार्य (व्यभिचारादि) नहीं करती है, वह पति लोक को प्राप्त करती है तथा उसे सज्जन लोग “पतिव्रता' कहते हैं।
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