स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति ।
अनभ्यर्च्य पितृन्देवांस्ततोऽन्यो नास्त्यपुण्यकृत् ।।
जो देवता तथा पितरों को बिना तृप्त किये दूसरे (जीवों) के मांस से अपने मांस को बढ़ाना चाहता है, उससे (बड़ा) कोई दूसरा पापी नहीं है।
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