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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 162
पतिं हित्वाऽवकृष्टं स्वमुत्कृष्टं या निषेवते । निन्द्यैव सा भवेल्लोके परपूर्वेति चोच्यते ।।
जो स्त्री नीचवर्ण (क्षत्रिय आदि) पति को छोड़कर उच्चवर्ण (ब्राह्मण आदि) पति का आश्रय (उसके साथ संभोग) करती है, वह भी लोक में निन्दित ही होती है और "पहले इसका दूसरा पति था” ऐसा लोग कहते हैं।
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