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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 129
नित्यमास्यं शुचि स्रीणां शकुनिः फलपातने । प्रस्रवे च शुचिर्वत्सः श्वा मृगग्रहणे शुचिः ।।
स्त्रियों का मुख सर्वदा शुद्ध है, फल गिराने में पक्षी (काक आदि का मुख) शुद्ध है अर्थात्‌ काक आदि पक्षी के चोंच मारने से गिरा हुआ फल शुद्ध है, (भैंस-गाय को) पेन्हाने (दूहने के पहले पीने) में वत्स (बछड़ा तथा बछिया या पाड़ा-पाड़ी आदि दूध देने वाली पशु के बच्चों का मुख) शुद्ध है और (शिकार के समय) हरिण (आदि पशु पकड़ने) में कुत्ता (का मुख) शुद्ध है।
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