ब्राह्मण मरे हुए असपिण्ड द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) को तथा माता के आप्त (सहोदर भाई, भगिनी आदि) बान्धवों का स्नेहपूर्वक (अदृष्ट भावना के बिना) बाहर निकालकर तीन रात्रि (दिन-रात) में शुद्ध होता है।
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