मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 100
असपिण्डं द्विजं प्रेतं विप्रो निर्हृत्य बन्धुवत्‌ । विशुद्ध्यति त्रिरात्रेण मातुराप्तांश्च बान्धवान्‌ ।।
ब्राह्मण मरे हुए असपिण्ड द्विज (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) को तथा माता के आप्त (सहोदर भाई, भगिनी आदि) बान्धवों का स्नेहपूर्वक (अदृष्ट भावना के बिना) बाहर निकालकर तीन रात्रि (दिन-रात) में शुद्ध होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें