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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 137
कृत्वा मूत्रं पुरीषं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्‌ । वेदमध्येष्यमाणश्च अन्नमश्चंश्च सर्वदा ।।
मल या मूत्र का त्यागकर वेदाध्ययन का इच्छुक या भोजन करता हुआ उक्त (५।१३६-१३७) शुद्धि करके (तीन बार) आचमन कर छिद्रेन्द्रियो (नाक, कान तथा नेत्र, मस्तक आदि) का स्पर्श करे।
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