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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 125
यावन्नापैत्यमेध्याक्ताद्वन्धो लेपश्च तत्कृतः । तावन्मृद्वारि चादेयं सर्वासु द्रव्यशुद्धिषु ।।
विष्ठा आदि से दूषित पात्र आदि से जब तक गन्ध तथा लेप (चिकनाहट) दूर न हो जाए, तब तक उनको मिट्टी तथा जल से शुद्ध करते रहना चाहिये।
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