दशाहं शावमाशौचं सपिण्डेषु विधीयते ।
अर्वाक् सञ्चयनादस्थ्नां त्र्यहमेकाहमेव वा ।।
सपिण्डों को (सात पीढ़ी वालों तक) मरणाशौच दश, चार, तीन या एक अहोरात्र (दिन-रात) लगता है।
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