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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 152
अनृतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कारकृत्पतिः । सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषितः ।।
विवाहकर्ता (पति) स्त्री को ऋतुकाल में तथा ऋतु-भिन्न काल में भी नित्य ही इस लोक में तथा परलोक में (सेवादिजन्य पुण्यकार्यो के द्वारा स्वर्गादि प्राप्ति से) सुख देने वाला है।
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