दिवाकीर्तिमुदक्यां च पतितं सूतिकां तथा ।
शबं तत्स्पृष्टिनं चैव स्पृष्ट्वा स्नानेन शुध्यति ।।
चाण्डाल, रजस्वला स्त्री, पतित (ब्रह्मघाती आदि, ११ अध्यायोक्त), सूतिका (जच्चा), मुर्दा तथा मुर्दे का स्पर्श करने वालों का स्पर्श कर स्नान मात्र से शुद्धि होती है।
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