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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 108
अद्धिर्गात्राणि शुद्धयन्ति मनः सत्येन शुद्ध्यति । विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिज्ञनिन शुद्धयति ।।
(पसीना आदि से दूषित) शरीर जल से (स्नानादि कर्म से), (निषिद्ध विचार-दूषित) मन सत्य से, जीवात्मा ब्रह्मविद्या तथा तप से तथा बुद्धि-ज्ञान से शुद्ध हो जाती है।
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