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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 88
वृथासंकरजातानां प्रत्रज्यासु च तिष्ठताम्‌ । आत्मनस्त्यागिनां चैव निवर्तेतोदकक्रिया ।।
मनु के अग्रिम (५।९ १) वचनानुसार तथा वसिष्ठ के वचनानुसार ब्रती ब्रह्मचारी को भी अपने आचार्य (२।१४०), उपाध्याय (२।१४१), पिता-माता और गुरु (२।१४२) के अतिरिक्त मृत व्यक्ति के निमित्त तिलाञ्जलि-दान आदि कर्मा का निषेध है, अपने आचार्य आदि के लिये तिलाञ्जलि-दान आदि करने पर भी इस (ब्रह्मचारी) का ब्रत खण्डित नहीं होता है।
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