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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 116
चरूणां स्रुक्स्रुवाणां च शुद्धिरुष्णेन वारिणा । स्फ्यशूर्पशकटानां च मुसलोलूखलस्य च ।।
(घृत आदि स्नेह से लिप्त) चरु; स्रक्‌ और खुवों की शुद्धि गर्म पानी (के द्वारा धोने) से होती है तथा स्फ्य, शूर्प शकट, मूसल और ओखली।
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