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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 21
संवत्सरस्यैकमपि चरेत्कृच्छं द्विजोत्तमः । अज्ञातभुक्तशुद्भ्यर्थ ज्ञातस्य तु विशेषतः ।।
श्रेष्ठ द्विज विना जाने (आज्ञात रूप में) खाये गये अभक्ष्य पदार्थो को खाने की शुद्धि के लिए वर्ष में एक बार प्राजापत्य कृच्छत्रत (११।२१ १) अवश्य करे तथा जानकर खाये गये अभक्ष्य पदार्थो की शुद्धि के लिए तो विशेष रूप से (अवश्य ही) उन स्थलों में कथित प्रायश्चित्त करे।
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