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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 83
न वर्धयेदघाहानि प्रत्यूहेन्नाग्रिषु क्रियाः । न च तत्कर्म कुर्वाणः सनाभ्योऽप्यशुचिर्भवेत्‌ ।।
अंशौच के दिनों को स्वयं न बढ़ावे और (वैसा करके) अग्निहोत्र कर्म का विघात न करे। उस कर्म को करता हुआ सपिण्ड (पुत्रादि) भी अशुद्ध नहीं होता है।
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