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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 168
अनेन विधिना नित्यं पञ्चयज्ञान्न हापयेत्‌ । द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत्‌ ।।
इस प्रकार सर्वदा (करता हुआ द्विज) पञ्चमहायज्ञों (३।७०) का त्याग कदापि नहीं करे, आयु के द्वितीय भाग को (शास्त्रानुसार) विवाह कर गृहस्थाश्रम में निवास करे।
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