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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 157
आसीतामरणात्क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी । यो धर्म एकपत्नीनां कांक्षन्ती तमनुत्तमम्‌ ।।
एक पत्नी व्रत (जिसका एक ही पति है, वह) अनुत्तम धर्म चाहने वाली स्त्री मरने तक अर्थात्‌ जीवन-पर्यन्त क्षमायुक्त, नियम से रहने वाली तथा मधु-मांस-मद्य को छोड़कर ब्रह्मचर्य से रहने वाली बने।
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