प्रोक्षणात्तृणकाष्ठं च पलालं चैव शुद्ध्यति ।
मार्जनोपाञ्जनैर्वेश्म पुनःपाकेन मृण्मयम् ।।
(चण्डालादि अस्पृश्य - स्पर्श से दूषित) घास, लकड़ी और पुआल पानी छिड़कने से शुद्ध होते हैं; (रजस्वला, प्रसूति आदि के रहने से दूषित) घर झाड़ देने तथा लीपने से और उच्छिष्ट आदि से दूषित मिट्टी के बर्तन फिर पकाने से शुद्ध होते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।