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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 133
विण्मूत्रोत्सर्गशुद्भ्यर्थंमृद्वायदियमर्थवत्‌ । दैहिकानां मलानां च शुद्धिषु द्वादशस्वपि ।।
मल-मूत्र त्याग करने वाली इन्द्रियों (गुदा तथा लिङ्ग) की तथा शरीर के वसा आदि मल-मूत्र सम्बन्धी बारह अशुद्धियों की गन्ध-लेप-क्षय के द्वारा शुद्धि होने के लिये आवश्यकतानुसार मिट्टी तथा पानी लेना चाहिये।
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