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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 150
यस्मै दद्यात्पिता त्वेनां भ्राता वाऽनुमते पितुः । तं शुश्रूषेत जीवन्तं संस्थितं च न लङ्घयेत्‌ ।।
पिता या पिता की अनुमति से भाई इस (स्त्री) को जिसके लिये दे अर्थात्‌ जिसके साथ विवाह कर दे, (स्त्री) जीते हुये उस पति की सेवा करे और उसके मरने पर (भी व्यभिचार, उसके श्राद्ध आदि का त्याग तथा पारलौकिक कार्य के खण्डन से) उस (पति) का उल्लंघन न करे।
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