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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 43
गृहे गुरावरण्ये वा निवसन्नात्मवान्द्रिजः । नावेदविहितां हिंसामापद्यपि समाचरेत्‌ ।।
गृहस्थाश्रम, ब्रह्मचर्याश्रम या वानप्रस्थाश्रम में रहता हुआ जितेन्द्रिय द्विज वेदविरुद्ध हिंसा को आपत्ति में भी न करे।
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