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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 56
न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने । प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ।।
मांस के खाने में, मद्य (के पीने) में और मैथुन (के करने) में दोष नहीं है; क्योंकि यह जीवों की प्रवृत्ति (स्वाभाविक धर्म) है; परन्तु उनसे निवृत्ति (उन मांसादि का त्याग करना) महान्‌ फल (स्वर्गादि देने) वाला है।
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