पाषण्डमाश्रितानां च चरन्तीनां च कामतः ।
गर्भभर्तृद्रुहां चैव सुरापीनां च योषिताम् ।।
पाखण्ड का आश्रय (वेद-वचन-विरुद्ध काषाय वस्र आदि को धारण) करने वाली, स्वेच्छाचारिणी (स्वेच्छा से एक या अनेक पुरुष का संसर्ग करने वाली), गर्भपात तथा पतिहत्या करने वाली और मद्य पीने वाली स्त्रियों का तिलाङ्जलिदान श्राद्ध आदि नहीं करना चाहिये।
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