विधान को जानने वाला द्विज बिना आपत्तिकाल में पड़े विधिरहित (देवों या पितरों को बिना समर्पण किये) मांस को न खावे; क्योंकि विधिरहित मांस को खाने वाला मरकर उन (जिसका मांस खाया है, उन) के द्वारा विवश (लाचारपरवश) होकर खाया जाता है।
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