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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 33
नाद्यादविधिना मांसं विधिज्ञोऽनापदि द्विजः । जग्ध्वा ह्यविधिना मांसं प्रेतस्तैरद्यतेऽवशः ।।
विधान को जानने वाला द्विज बिना आपत्तिकाल में पड़े विधिरहित (देवों या पितरों को बिना समर्पण किये) मांस को न खावे; क्योंकि विधिरहित मांस को खाने वाला मरकर उन (जिसका मांस खाया है, उन) के द्वारा विवश (लाचारपरवश) होकर खाया जाता है।
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