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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 111
निर्लेपं काञ्जनं भाण्डमद्भिरेव विशुद्ध्यति । अब्जमश्ममयं चैव राजतं चानुपस्कृतम्‌ ।।
घृतादि के लेप से रहित (तथा जो जूठा न हो ऐसे) सुवर्ण-पात्र, जल में होने वाले शङ्ख-मोती आदि, फूल-पत्ती या चित्रादि से रहित अर्थात्‌ सादे चाँदी के बर्तन आदि की शुद्धि केवल जल से ही होती है।
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