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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 115
मार्जनं यज्ञपात्राणां पाणिना यज्ञकर्मणि । चमसानां ग्रहाणां च शुद्धिः प्रक्षालनेन तु ।।
चमस, ग्रह तथा अन्य यज्ञपात्रों की शुद्धि यज्ञ कर्म में हाथ से पोंछकर जल से धोने से होती है।
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