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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 122
मद्येर्मूत्रै; पुरीषैर्वा ष्ठीवनैः पूयशोणितैः । संस्पृष्टं नैव शुद्ध्येत पुनःपाकेन मृन्मयम्‌ ।।
मद्य, मूत्र, मल (पाखाना), थूक या खकार, पीव और रक्त से दूषित मिट्टी के बर्तन फिर पकाने से भी शुद्ध नहीं होते हैं । (यह वचन ५।१२२ श्लोक के चतुर्थ पादोक्त शुद्धि का बाधक है)
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