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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 98
विप्रः शुध्यत्यपः स्पृष्ट्वा क्षत्रियो वाहनायुधम्‌ । वैश्यः प्रतोदं रश्मीन्वा यष्टिं शूद्रः कृतक्रिया ।।
अशौच के बाद यज्ञादि को किया हुआ ब्राह्मण जल का, क्षत्रिय वाहन (रथ, हाथी, घोड़ा आदि) का, वैश्य कोड़े (या चाबुक) या रथ के बाग (रास) का और शूद्र छड़ी (या लाठी) का (दाहिने हाथ से) स्पर्श कर शुद्ध होता है।
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