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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 31
यज्ञाय जग्धिर्मासस्येत्येष दैवो विधिः स्मृतः । अतोऽन्यथाप्रवृत्तिस्तु राक्षसो विधिरुच्यते ।।
यज्ञ के लिए (शास्त्रोक्त विधि से) मांस का भक्षण करना दैव (देव सम्बन्धी) विधि है और इसके विपरीत (अपने लिए या शास्त्रविरुद्ध यज्ञ के नाम पर) मांस का भक्षण करना राक्षस (राक्षस-सम्बन्धी) विधि है (अत: अपने उदर के लिए या शास्त्रविरुद्ध यज्ञ के नाम पर - जैसा प्रायः आजकल बलिदान के नाम पर सहस्रो बकरे आदि का वध किया जाता है - मांस का भक्षण करना सर्वथा त्याज्य माना गया है)।
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