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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 161
नान्योत्पन्ना प्रजाऽस्तीह न चान्यस्य परिग्रहे । न द्वितीयश्च साध्वीनां क्रचिद्धर्तोपदिश्यते ।।
इस लोक में परपुरुष से उत्पन्न सन्तान तथा परस्त्री में उत्पन्न सन्तान शास्त्रोक्त सन्तान नहीं होती है और पतिव्रता स्त्रियों का दूसरा पति भी कहीं पर (किसी शास्त्र में) नहीं कहा गया है।
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