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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 86
नारं स्पृष्ट्वाऽस्थि सस्नेहं स्नात्वा विप्रो विशुद्ध्यति । आचम्यैव तु निःस्नेहं गामालभ्यार्कमीक्ष्य वा ।।
मनुष्य की गीली (रक्तादि से युक्त-ताजी) हड्डी छूकर स्नान करने से ब्राह्मण शुद्ध होता है तथा सूखी हड्डी को छूकर आचमन करने, गौ का स्पर्श करने या सूर्यदर्शन करने से शुद्ध होता है।
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