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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 22
यज्ञार्थ ब्राह्मणैर्वध्याः प्रशस्ता मृगपक्षिणः । भरृत्यानां चैव वृत्त्यर्थमगस्त्यो ह्याचरत्‌ पुरा ।।
द्विज यज्ञ के लिए तो अवश्य तथा रक्षणीय माता-पितादि की रक्षा के लिए शासतरविहित पशु-पक्षियों का वध करे। ऐसा अगस्त्य ऋषि ने पहले किया था।
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