जननेप्येवमेव स्यान्मातापित्रोस्तु सूतकम् ।
सूतकं मातुरेव स्यादुपस्पृश्य पिता शुचिः ।।
जिस प्रकार यह मरणाशौच सपिण्डों में कहा गया है, उसी प्रकार जन्म (बच्चा पैदा) होने पर भी पूर्ण शुद्धि चाहने वाले सपिण्डों के लिए अशौच होता है।
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