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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 126
त्रीणि देवाः पवित्राणि ब्राह्मणानामकल्पयन्‌ । अदृष्टमद्भिर्निर्णिक्तिं यच्च वाचा प्रशस्यते ।।
देवताओं ने तीन प्रकार की वस्तुओं को ब्राह्मणों के लिए पवित्र कहा है-प्रथम जिसकी अशुद्धि स्वयं आँखों से नहीं देखी गयी हो! द्वितीय - अशुद्धि का सन्देह होने पर जिस पर जल छिड़क दिया गया हो तथा तृतीय - जो वचन से प्रशस्त कहा गया हो अर्थात्‌ जिसको “यह पवित्र है” ऐसा ब्राह्मण कह दे।
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