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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 57
प्रेतशुद्धिं प्रवक्ष्यामि द्रव्यशुद्धिं तथैव च । चतुर्णामपि वर्णानां यथावदनुपूर्वशः ।।
(भृगु मुनि महर्षियों से कहते हैं कि अब) चारों वर्णो की प्रेतशुद्धि (मरणाशौच से शुद्धि) तथा द्रव्यशुद्धि (तेजसादि पदार्थों की शुद्धि) को क्रम से यथायोग्य कहुँगा।
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