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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 48
नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्कचित्‌ । न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्‌ ।।
जीवों की बिना हिंसा किये कहीं भी मांस नहीं उत्पन्न हो सकता है और जीवों की हिंसा स्वर्ग-साधन नहीं है। अत: मांस को छोड़ देना (नहीं खाना) चाहिये।
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