नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्कचित् ।
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत् ।।
जीवों की बिना हिंसा किये कहीं भी मांस नहीं उत्पन्न हो सकता है और जीवों की हिंसा स्वर्ग-साधन नहीं है। अत: मांस को छोड़ देना (नहीं खाना) चाहिये।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
मनुस्मृति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
मनुस्मृति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।