धन के लिए पशु (पक्षी आदि) का वध करने वाले (वधिक-व्याध आदि) को वैसा पाप नहीं होता, जैसा पाप व्यर्थ (देव-पितर के कार्य के बिना) माँस भक्षण करने वाले को मारने पर होता है।
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