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मनुस्मृति • अध्याय 5 • श्लोक 132
मक्षिका विप्रुषश्छाया गौरश्वः सूर्यरश्मयः । रजो भूर्वायुरग्निश्च स्पर्शे मेध्यानि निर्दिशेत्‌ ।।
मक्खी, (मुख से निकली छोटी-छोटी) बुँदे, छाया (परछाहीं) गौ, घोड़ा, सूर्यकिरण, धूलि, भूमि, वायु तथा अग्नि को स्पर्श में शुद्ध जानना चाहिये।
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